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लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति कहाँ रखें? जगह, दिशा और क्रम
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लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति कहाँ रखें? दिशा और बैठाने का सही तरीका

लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति साफ चौकी या मजबूत शेल्फ पर रखें। मूर्ति का पूरा आधार सतह पर टिकना चाहिए। सामने बैठकर फूल चढ़ाने और थाली रखने की जगह भी हो।

पूजा के कमरे के लिए उत्तर-पूर्व का कोना एक पारंपरिक स्थान है। इसे ईशान कोण कहते हैं। यह चौकी रखने की जगह बताता है, मूर्ति के चेहरे की दिशा नहीं। दाएँ-बाएँ का क्रम पहचानने के लिए मूर्तियों के सामने बैठें।

लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति घर में कहाँ रखें?

घर में मूर्ति रखने के लिए मजबूत चौकी या शेल्फ चुनें। सामने से पूजा करने में दरवाजा, अलमारी या दूसरे सामान की बाधा न हो। उत्तर-पूर्व में ऐसा स्थान उपलब्ध हो तो वहाँ पूजा की चौकी रख सकते हैं।

बृहत्संहिता में पूजा का कमरा ईशान में रखने की सलाह मिलती है। कमरे का ईशान और पूरे घर का ईशान अलग हो सकते हैं। घर के दक्षिण हिस्से में बना कमरा इसका उदाहरण है। उस कमरे का उत्तर-पूर्व कोना पूरे घर का उत्तर-पूर्व नहीं होगा।

अलग पूजा का कमरा न हो तो एक शेल्फ पर पूजा के लिए अलग हिस्सा बनाएं। मूर्तियों के साथ थाली रखने का स्थान भी बचाएं। ईशान में जगह न हो तो उपलब्ध साफ स्थान की जाँच करें। अलमारी का दरवाजा खोलने या सामान उठाने पर मूर्तियाँ हिलनी नहीं चाहिए।

चौकी के ऊपर लटकती सजावट मूर्तियों के सिर को न छुए। सामने रोज इस्तेमाल की चीजें जमा न करें। जैसे चाबियाँ और फोन उठाते समय आपका हाथ मूर्ति से टकरा सकता है। ऐसे सामान पूजा की चौकी से अलग रखें।

चौकी के आगे थाली रखने का स्थान भी बचाएं। थाली उठाते समय हाथ मूर्तियों के बीच से न निकालना पड़े।

मूर्ति का मुख किस दिशा में रखें?

सामने से पूजा करते समय मूर्ति का चेहरा आपकी ओर हो। आप पूर्व की ओर मुख करके बैठें, तो सामने की मूर्ति पश्चिममुखी होगी। पश्चिममुखी यानी उसका चेहरा पश्चिम की ओर होगा।

चौकी ईशान में हो सकती है और मूर्तियों का चेहरा पश्चिम की ओर। इसमें चौकी का कोना और चेहरे की दिशा अलग हैं। “ईशान में रखें” सुनकर मूर्ति का चेहरा भी उत्तर-पूर्व की ओर न घुमाएं।

आप और मूर्ति आमने-सामने हों तो दिशाएँ इस तरह होंगी:

आपका मुख सामने की मूर्ति का मुख
पूर्व पश्चिम
पश्चिम पूर्व
उत्तर दक्षिण
दक्षिण उत्तर

ये आमने-सामने बैठने की दिशाएँ हैं। पूजा में कौन सी दिशा अपनानी है, उसे अलग तय करें। “पूर्वमुखी” का निर्देश मिले तो पूछें कि यह किसका मुख है। मूर्ति का और पूजा करने वाले का मुख एक जैसा न समझें।

फोन के कम्पास से दिशा देखें तो फोन समतल रखें। एक ही स्थान पर दिशा बार-बार बदलती दिखे तो दूसरे कम्पास से मिलाएं। कमरे का कोना पहचानने के लिए उसके उत्तर और पूर्व वाले हिस्से देखें।

लक्ष्मी जी को गणेश जी के किस तरफ रखें?

लक्ष्मी जी का स्थान तय करते समय पहले देखने की तरफ समझें। “गणेश जी की अपनी दाईं तरफ” और “आपके दाएँ” अलग हैं। सामने खड़े व्यक्ति का दायाँ हाथ आपकी बाईं तरफ दिखता है। दोनों मूर्तियों के चेहरे आपकी ओर हों तो यही अंतर यहाँ भी होगा।

इन 2 निर्देशों को सामने से पढ़ें:

  • “आपके बाएँ गणेश जी और आपके दाएँ लक्ष्मी जी” में क्रम पूजा करने वाले की तरफ से बताया गया है।
  • “गणेश जी की अपनी दाईं तरफ लक्ष्मी जी” में सामने से लक्ष्मी जी आपके बाएँ दिखेंगी। गणेश जी आपके दाएँ होंगे।

इन दोनों निर्देशों में मूर्तियों का क्रम उलटा है। घर में तय क्रम हो तो सामने बैठकर वही मिलाएं। केवल फोटो में दूसरा क्रम देखकर अपनी मूर्तियाँ न बदलें।

पहली बार दोनों मूर्तियाँ रख रहे हों तो घर के बड़े या पंडित जी से क्रम पूछें। सवाल ऐसा रखें: “मैं सामने बैठूँ तो मेरे बाएँ कौन और दाएँ कौन रहेगा?” इससे जवाब आपकी बैठने की तरफ से मिलेगा।

पहले गणेश जी की पूजा करने से उनका स्थान बाएँ या दाएँ तय नहीं होता। पूजा शुरू करने का क्रम और मूर्तियों की तरफ अलग हैं।

लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति रखने के 6 चरण

मूर्ति, थाली और बैठने की जगह एक साथ जाँचें। ऐसा न हो कि मूर्तियाँ रखने के बाद पूजा का सामान टिके ही नहीं। चौकी तैयार करने के लिए यह क्रम अपनाएं।

  1. चौकी साफ करें। धूल हटाकर सतह जाँचें। चौकी हिलती हो तो पहले उसका आधार ठीक करें। कपड़ा बिछाएं तो किनारा नीचे इतना न लटके कि हाथ में फँसे।
  2. सामने बैठकर पहुँच जाँचें। चटाई या कुर्सी पर बैठकर थाली तक हाथ बढ़ाएं। फूल चढ़ाने के लिए बहुत आगे झुकना पड़े तो चौकी की दूरी बदलें। खड़े होकर जाँचने से बैठने की पहुँच का पता नहीं चलेगा।
  3. मूर्ति का चेहरा चुनी दिशा में रखें। चेहरे की तरफ से दिशा मिलाएं। केवल पीछे की दीवार देखकर दिशा तय न करें। मूर्ति के सामने बैठने पर उसका चेहरा आपकी ओर होना चाहिए।
  4. दोनों का क्रम सामने से मिलाएं। बताया गया दाएँ-बाएँ क्रम जाँचें। अलग मूर्तियाँ हों तो दोनों के आधार पूरी तरह टिकें। कपड़े में सिलवट हो तो उसे सीधा करें।
  5. थाली और दीया रखें। थाली उठाने में मूर्ति से टक्कर न हो। दीया गर्मी सहने वाली सतह पर टिके। लौ तक कपड़ा, कागज या सूखी सजावट न पहुँचे।
  6. हाथ बढ़ाकर आखिरी जाँच करें। फूल चढ़ाने और थाली उठाने की पहुँच देखें। मूर्ति या फ्रेम हिलता हो तो उसका सहारा ठीक करें। पूजा के दौरान जलते दीये को न खिसकाना पड़े।

ये चरण चौकी तैयार करने के हैं। प्राण-प्रतिष्ठा मूर्ति की धार्मिक स्थापना के लिए की जाने वाली विशेष पूजा है। केवल चौकी सजाने को उस पूजा की पूरी विधि न मानें।

दुकान और कार्यालय में मूर्ति कहाँ रखें?

दुकान या ऑफिस में मूर्ति आने-जाने के रास्ते से अलग रखें। ग्राहक का बैग, पैकिंग का सामान या कर्मचारी का हाथ उससे न टकराए। दरवाजा खुलने पर चौकी से टक्कर न हो, यह भी जाँचें।

काउंटर पर रोज बिल या पैकिंग का काम हो तो पूजा की चौकी अलग रखें। वहाँ पूजा के समय थाली और खाते रखने का स्थान रहे। बिल और पैकिंग का सामान वहीं न जमाएं। इससे पूजा करते समय सामान हटाने की जरूरत कम पड़ेगी।

बही-खाता पूजन में हिसाब की किताबें मूर्ति के सामने पहुँच में रखें। किताबों से चेहरे न ढकें। थाली उठाकर देखें कि खाते या फ्रेम उससे टकराते तो नहीं। तिजोरी से निकाले सिक्के और किताबें भी लौ से दूर रहें।

कुर्सी पर बैठकर पूजा हो तो बैठे हुए थाली तक हाथ बढ़ाकर जाँचें। पानी का बर्तन कंप्यूटर, प्लग और बिजली के तारों से दूर रखें। अस्थायी चौकी दरवाजे या बाहर निकलने के रास्ते को न घेरे।

ऑफिस में दीया जलाने की अनुमति पहले पूछ लें। जलते दीये के पास कोई व्यक्ति रहे। दुकान बंद करके उसे जलता हुआ न छोड़ें। हिसाब की किताबें उठाते समय भी दीये से टक्कर न हो।

जुड़ी हुई मूर्ति या फोटो कैसे रखें?

जुड़ी हुई लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति में दोनों एक आधार पर बने होते हैं। उनकी तरफ बदलने के लिए उन्हें खींचकर अलग न करें। पूरा सेट आधा चक्कर घुमाएँगे तो दोनों चेहरे पीछे हो जाएंगे।

किसी पूजा में अलग मूर्तियाँ रखने को कहा गया हो तो अपना सेट दिखाकर पूछें। केवल “लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति है” कहने से उसकी बनावट पता नहीं चलेगी। सेट एक ही आधार पर बना है, यह भी बताएं।

लक्ष्मी-गणेश की फोटो का क्रम फ्रेम के सामने से देखें। मोबाइल पर दाएँ-बाएँ उलटी की गई तस्वीर का क्रम अलग दिख सकता है। मूर्तियों की तरफ मिलाने के लिए ऐसी उलटी तस्वीर का सहारा न लें।

फ्रेम को मजबूत सहारे पर टिकाएं या ठीक से लगाएं। फूल चढ़ाते समय वह आगे न गिरे। फूलों से चेहरे न ढकें और जल से फोटो न भीगे। थाली या कलश को फ्रेम का सहारा बनाकर न रखें।

नया सेट खरीद रहे हों तो Satvikly का लक्ष्मी-गणेश मूर्ति सेट देखें। आधार का आकार, जुड़ी बनावट और सफाई का तरीका खरीदने से पहले पूछें।

दिवाली के बाद मूर्ति कहाँ रखें?

रोज की पूजा वाली मूर्ति दिवाली के बाद अपने मंदिर या पूजा की शेल्फ पर रखें। अस्थायी चौकी हटाते समय पहले थाली और दूसरे सामान उठाएं। फूल या कपड़ा खींचने से मूर्ति का आधार न हिले।

पूजा के अंत की विदाई और मूर्ति का जल-विसर्जन अलग हैं। देवता को सम्मान से विदा करने की प्रार्थना भी विसर्जन कहलाती है। इस शब्द को सुनकर हर मूर्ति को पानी में डालना जरूरी न मानें।

विसर्जन का निर्देश मिले तो पूछें कि पूजा की विदाई करनी है या जल-विसर्जन। जल-विसर्जन होना हो तो मूर्ति किस चीज की बनी है, यह जानें। धातु या रंगी मूर्ति को पानी में घुलने वाली मिट्टी की मूर्ति जैसा न समझें।

जल-विसर्जन के लिए अपने क्षेत्र में तय स्थान की जानकारी लें। नगरपालिका से टंकी या कुंड की व्यवस्था पूछ सकते हैं। केवल पास में नदी या तालाब होने से वहीं मूर्ति डालने का फैसला न करें।

पुरानी मूर्ति मंदिर में देना चाहते हों तो पहले फोन करके पूछें। वहाँ पुरानी मूर्तियाँ ली जाती हों तभी उसे ले जाएं। रंग या चढ़ी परत वाली मूर्ति की सफाई का तरीका विक्रेता से पूछें। सफाई के लिए उस पर जल या दूध डालना अपने आप तय न करें।

लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति रखने से जुड़े सवाल

दोनों मूर्तियों की ऊँचाई अलग हो तो कैसे रखें?

दोनों के चेहरे सामने से दिखें और पूरे आधार सतह पर टिकें। छोटी मूर्ति को कपड़े की ढीली तह पर न उठाएं। ऊँचा करना हो तो मजबूत आधार लगाएं, जो फूल चढ़ाते समय न हिले।

दीवार के पास मूर्ति रखते समय क्या देखें?

पीछे सफाई करने के लिए हाथ पहुँच सके, इतनी दूरी रखें। मूर्ति का आधार चौकी के किनारे से बाहर न निकले। फोटो लगी हो तो उसका सहारा मजबूत हो। थाली रखने पर वह आगे न खिसके।

कलश मूर्ति के चेहरे को ढक रहा हो तो क्या करें?

कलश और मूर्तियों के बीच इतना अंतर रखें कि दोनों चेहरे दिखें। फूल चढ़ाने या आरती करने में कलश से टक्कर न हो। कलश का स्थान तय बताया गया हो तो पंडित जी को चौकी दिखाकर पूछें।

प्राण-प्रतिष्ठा वाली मूर्ति नई चौकी पर रख सकते हैं?

रोज दीया जलाना और प्राण-प्रतिष्ठा की विशेष पूजा अलग हैं। प्राण-प्रतिष्ठा हुई हो तो पूजा कराने वाले से स्थान बदलने के बारे में पूछें। उन्हें नई चौकी और मूर्ति रखने वाला स्थान भी दिखाएं।

गणेश जी की सूंड की तरफ से लक्ष्मी जी का स्थान तय होता है?

सूंड किस ओर मुड़ी है और लक्ष्मी जी किस तरफ हैं, अलग बातें हैं। सिर्फ सूंड देखकर लक्ष्मी जी का स्थान न बदलें। मूर्तियों का जो क्रम बताया गया है, उसे सामने से मिलाएं।

रंग उतरना और मूर्ति का भाग टूटना एक बात है?

रंग या ऊपर की परत उतरना सतह का नुकसान है। हाथ या सूंड टूटना मूर्ति के किसी भाग का नुकसान है। टूटा हिस्सा पंडित जी को दिखाकर उस मूर्ति की पूजा के बारे में पूछें।

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