लक्ष्मी-गणेश पूजा की शुरुआत गणेश जी की वंदना से करें। फिर लक्ष्मी माता का पूजन करके दोनों आरतियाँ गाएँ। घर की पूजा में छोटे नमस्कार और स्तुति पढ़ सकते हैं। परिवार में पूजन के चरण अलग हों तो उस क्रम का पालन करें।
लक्ष्मी गणेश पूजा में पाठ का क्रम
पूजा से पहले पढ़ने वाले मंत्र और आरतियाँ सामने रखें। शुरुआत में पूजा का दीप जलाएँ और अर्पण की वस्तुएँ पास रखें।
| क्रम | कौनसा पाठ | कब पढ़ें |
|---|---|---|
| 1 | गणेश नमस्कार और वक्रतुण्ड श्लोक | पूजा की शुरुआत में गणेश जी का स्मरण करें। |
| 2 | लक्ष्मी माता का नमस्कार | माता का ध्यान करके उन्हें प्रणाम करें। |
| 3 | फूल धूप और दीप के अर्पण पाठ | संबंधित वस्तु अर्पित करते समय उसका पाठ पढ़ें। |
| 4 | नैवेद्य और लक्ष्मी स्तुति | भोग यानी नैवेद्य अर्पित करें। फिर चुनी हुई स्तुति पढ़ें। |
| 5 | गणेश और लक्ष्मी की आरतियाँ | पहले गणेश जी और फिर लक्ष्मी माता की आरती करें। |
| 6 | क्षमा और समर्पण प्रार्थना | पुष्पांजलि और प्रणाम के बाद प्रार्थना करें। पूजा पूरी करके प्रसाद बाँटें। |
पूजा के अर्पण और सेवाओं को उपचार कहते हैं। षोडशोपचार का अर्थ 16 उपचार वाली पूजा है। इसमें स्नान, वस्त्र और अन्य अर्पण भी आते हैं।
गणेश जी के मंत्र और हिंदी अर्थ
गणेश जी का छोटा नमस्कार
ॐ गणपतये नमः।
अर्थ: गणपति जी को प्रणाम है। इसमें गणपतये का अर्थ गणपति को और नमः का अर्थ नमस्कार है।
गणेश जी को प्रणाम करते समय यह छोटा नमस्कार पढ़ें। अर्पण के पाठ में भी गणेश जी के लिए यही नाम आता है।
वक्रतुण्ड महाकाय श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
अर्थ: हे गणेश जी, आपकी सूँड मुड़ी हुई और शरीर विशाल है। आपका तेज एक करोड़ सूर्यों के समान है। मेरे सभी काम सदा बिना बाधा पूरे करें।
- वक्रतुण्ड: मुड़ी हुई सूँड वाले गणेश जी का संबोधन।
- सूर्यकोटि: करोड़ सूर्यों की उपमा; कोटि का अर्थ करोड़ है।
- सर्वकार्येषु: सभी कार्यों में।
- सर्वदा: सदा, अर्थात हर समय।
बीजाक्षर सहित गणेश मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः।
अर्थ: गं बीजाक्षर सहित गणपति जी को प्रणाम है। बीजाक्षर का साधारण शब्दों जैसा शाब्दिक अनुवाद नहीं होता।
गं में ग के ऊपर अनुस्वार चिह्न है। इसकी ध्वनि सीखने के लिए संस्कृत पाठ सिखाने वाले शिक्षक को सुनें।
लक्ष्मी माता के मंत्र और स्तुति
लक्ष्मी माता का छोटा नमस्कार
ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
अर्थ: महालक्ष्मी माता को प्रणाम है। इसमें महालक्ष्म्यै का अर्थ महालक्ष्मी को है।
माता का ध्यान करके यह छोटा नमस्कार पढ़ें। महालक्ष्म्यै में क्ष्म्यै वाला संयुक्त अक्षर समूह ध्यान से पढ़ें।
महालक्ष्मी अष्टकम् का पहला श्लोक
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
अर्थ: हे महामाया महालक्ष्मी माता, आपको प्रणाम है। आप श्रीपीठ पर विराजती हैं और देवता आपकी पूजा करते हैं। आपके हाथों में शंख, चक्र और गदा हैं।
महामाया देवी की माया-शक्ति का संबोधन है। श्रीपीठ में पीठ का अर्थ आसन या प्रतिष्ठित स्थान है। सुरपूजिते का अर्थ देवताओं द्वारा पूजित है।
महालक्ष्म्यै का अर्थ महालक्ष्मी को और महालक्ष्मि का अर्थ हे महालक्ष्मी है। नमस्कार में पहला रूप और इस स्तुति में दूसरा रूप आता है।
नमस्तेऽस्तु और नमोऽस्तु में ऽ अवग्रह चिह्न है। यह संधि में छूटे अ को दर्शाता है। पढ़ते समय इनकी ध्वनि नमस्तेस्तु और नमोस्तु होती है।
बीजाक्षर सहित लक्ष्मी मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
अर्थ: हे कमला, कमल में निवास करने वाली माता, प्रसन्न हों। महालक्ष्मी माता को प्रणाम है।
कमले माता का नाम लेकर किया गया संबोधन है। कमलालये का अर्थ कमल में निवास करने वाली है। प्रसीद का अर्थ प्रसन्न हों है। श्रीं और ह्रीं इस पाठ के बीजाक्षर हैं।
फूल धूप दीप और नैवेद्य के छोटे अर्पण पाठ
इन छोटे अर्पण पाठों में गणेश जी के लिए गणपतये आता है। लक्ष्मी माता के लिए महालक्ष्म्यै नाम लिया है। समर्पयामि अर्थात मैं अर्पित करता हूँ।
धूप और दीप की क्रिया के शब्द पूजा-पद्धति के अनुसार बदलते हैं। यह अंतर केवल देवता बदलने के कारण जरूरी नहीं होता।
फूल अर्पित करते समय
गणेश जी के लिए
ॐ गणपतये नमः पुष्पं समर्पयामि।
लक्ष्मी माता के लिए
ॐ महालक्ष्म्यै नमः पुष्पं समर्पयामि।
अर्थ: गणेश जी या लक्ष्मी माता को प्रणाम करके फूल अर्पित करें। पुष्पं का अर्थ फूल है; समर्पयामि अर्थात मैं अर्पित करता हूँ।
धूप अर्पित करते समय
गणेश जी के लिए
ॐ गणपतये नमः धूपं घ्रापयामि।
लक्ष्मी माता के लिए
ॐ महालक्ष्म्यै नमः धूपं समर्पयामि।
अर्थ: घ्रापयामि में धूप की सुगंध ग्रहण करने का निवेदन है। समर्पयामि में धूप अर्पित करने का निवेदन है। कुछ पाठों में सुगंध अर्पण के लिए आघ्रापयामि रूप मिलता है।
दीप दिखाते समय
गणेश जी के लिए
ॐ गणपतये नमः दीपं दर्शयामि।
लक्ष्मी माता के लिए
ॐ महालक्ष्म्यै नमः दीपं समर्पयामि।
अर्थ: दर्शयामि अर्थात मैं दिखाता हूँ और समर्पयामि अर्थात मैं अर्पित करता हूँ। दोनों पंक्तियाँ पूजन के समय देवता को दीप अर्पित करने के लिए हैं।
दीप अर्पण के बाद भोग अर्पित करने का चरण आता है। आरती के समय दीप घुमाते हुए उसका पाठ गाएँ। पूजन में दीप दिखाना और अंत में आरती करना दो चरण हैं।
नैवेद्य अर्पित करते समय
गणेश जी के लिए
ॐ गणपतये नमः नैवेद्यं समर्पयामि।
लक्ष्मी माता के लिए
ॐ महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यं समर्पयामि।
अर्थ: मैं गणेश जी या लक्ष्मी माता को भोजन अर्पित करता हूँ। नैवेद्य का अर्थ पूजा में अर्पित भोजन है।
भोग सामने रखकर देवता के लिए दी गई पंक्ति पढ़ें। नैवेद्य की विस्तृत प्रार्थना पढ़ते हों तो वही पाठ पूरा करें।
श्रीसूक्त महालक्ष्मी अष्टकम् और गणपति अथर्वशीर्ष
श्रीसूक्त
श्रीसूक्त लक्ष्मी की स्तुति का वैदिक पाठ है। इसका संबंध ऋग्वेद के खिल यानी पूरक पाठों से है।
श्रीसूक्त का पूरा देवनागरी पाठ
ऋचा वैदिक मंत्र का पद होती है। प्रचलित श्रीसूक्त में 15 मुख्य ऋचाओं के बाद पाठ-विधि का पद आता है। उसे जोड़कर कुछ पाठ कुल 16 मंत्र गिनते हैं। इसके बाद फलश्रुति और अन्य प्रार्थनाएँ भी मिल सकती हैं।
श्रीसूक्त के स्वरयुक्त और स्वररहित देवनागरी पाठ मिलते हैं। वैदिक स्वर सीखने के लिए संस्कृत पाठ के शिक्षक को सुनें। स्वरयुक्त पाठ में चिह्नों के अनुसार उच्चारण का अभ्यास करें।
महालक्ष्मी अष्टकम्
महालक्ष्मी अष्टकम् में 8 मुख्य श्लोक हैं। फलश्रुति के पद उसके बाद आते हैं। फलश्रुति पाठ के फल का वर्णन करने वाले पदों को कहते हैं।
लक्ष्मी स्तुति के चरण पर पूरा अष्टकम् पढ़ सकते हैं। सभी मुख्य श्लोक पढ़ने के बाद पूजा का अगला चरण करें।
महालक्ष्मी अष्टकम् का पूरा पाठ
गणपति अथर्वशीर्ष
गणपति अथर्वशीर्ष गणेश जी का उपनिषद् पाठ है। इसमें गणेश तत्त्व, बीज मंत्र और ध्यान का वर्णन है। ॐ गं गणपतये नमः इसी पाठ में मिलता है।
गणेश जी की आरती और भावार्थ
पूजन और भोग के बाद गणेश जी की आरती करें। मुखड़ा हर अंतरे के बाद दोहराएँ और दीप सावधानी से घुमाएँ।
जय गणेश देवा आरती का पाठ
मुखड़ा
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
पहला अंतरा
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
दूसरा अंतरा
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
तीसरा अंतरा
अँधे को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
चौथा अंतरा
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
गणेश आरती का भावार्थ
मुखड़े में माता-पिता का स्मरण: भक्त गणेश जी की जय बोलता है। माता पार्वती और पिता महादेव का स्मरण करता है। जाकी का अर्थ जिनकी है।
पहले अंतरे में गणेश जी का स्वरूप: एकदन्त का अर्थ एक दाँत वाले है। दयावन्त उनकी दयालुता का वर्णन करता है। आरती में उनके 4 हाथों और वाहन का स्मरण है। मूसे शब्द मूषक यानी चूहे के लिए आया है।
दूसरे अंतरे में भोग और सेवा: भक्त पान, फूल, मेवा और लड्डू अर्पित करता है। सन्त गणेश जी की सेवा करते हैं। लड्डुअन शब्द लड्डुओं के लिए आया है। मेवा यहाँ भोग में अर्पित सूखे फलों के लिए है।
तीसरे अंतरे में कृपा का भक्ति वर्णन: पद में दृष्टिहीन को दृष्टि और रोगी को स्वस्थ शरीर मिलने का वर्णन है। संतानहीन को संतान और निर्धन को धन मिलना भी कृपा के रूप में गाया है।
कोढ़िन यहाँ कुष्ठरोग से पीड़ित व्यक्ति के लिए आया है। बाँझन संतानहीन स्त्री के लिए आया पुराना शब्द है। काया का अर्थ शरीर और माया का अर्थ यहाँ धन है।
अंतिम अंतरे में शरणागति: भक्त गणेश जी की शरण में आने का भाव व्यक्त करता है। वह अपनी पूजा और सेवा स्वीकार करके उसे सफल करने की प्रार्थना करता है।
गणेश आरती में अलग शब्द और अतिरिक्त पद
कुछ संस्करणों में तिलक की जगह सिन्दूर का पाठ मिलता है। फूल की जगह फल वाली पंक्ति भी प्रचलित है। अंत का पद भी कुछ पाठों में बदलता या अतिरिक्त मिलता है। आरती गाते समय अपने चुने हुए संस्करण की पंक्तियाँ पढ़ें।
लक्ष्मी माता की आरती और भावार्थ
गणेश आरती के बाद लक्ष्मी माता की आरती करें। यहाँ हर, विष्णु और धाता वाला प्रचलित पाठ है। प्रत्येक पद के बाद ॐ जय लक्ष्मी माता दोहराएँ।
लक्ष्मी माता की आरती का पूरा पाठ
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हर विष्णु धाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जगन्माता।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
लक्ष्मी आरती के 8 पदों का भावार्थ
- माता की निरंतर आराधना: भक्त लक्ष्मी माता की जय बोलता है। निशिदिन का अर्थ रात-दिन और सेवत का अर्थ आराधना करना है। इस संस्करण में हर शिव और धाता ब्रह्मा के नाम हैं। पद में विष्णु सहित तीनों की देवी आराधना का उल्लेख है।
- जगन्माता के रूपों का स्मरण: उमा, रमा और ब्रह्माणी में देवी के रूपों का स्मरण है। उमा पार्वती का और रमा लक्ष्मी माता का नाम है। ब्रह्माणी ब्रह्मा की शक्ति का नाम है। सूर्य और चन्द्रमा देवी का ध्यान करते हैं। नारद ऋषि उनका गुणगान करते हैं।
- दुर्गा रूप और समृद्धि का वर्णन: पद में देवी के दुर्गा रूप की स्तुति है। निरंजनी उनके निर्मल स्वरूप का वर्णन करता है। ऋद्धि का अर्थ समृद्धि और सिद्धि का अर्थ सफलता है। भक्त माता की कृपा से सुख, धन और सिद्धि मिलने का गुणगान करता है।
- संसार से पार उतारने वाली माता: पाताल निवासिनि का अर्थ पाताल में निवास करने वाली है। शुभदाता देवी के शुभ देने वाले स्वरूप का वर्णन है। कर्म प्रभाव प्रकाशिनि में कर्म के प्रभाव को प्रकट करने का भाव है। भवनिधि संसार-सागर और त्राता उससे पार उतारने वाली के लिए आया है।
- घर में अच्छे गुण और मन का भरोसा: सद्गुण का अर्थ अच्छे गुण है। पद में माता के निवास से घर में ये गुण आने का भाव है। मन नहीं घबराता वाली पंक्ति भक्त के भरोसे को व्यक्त करती है।
- भोजन वस्त्र और यज्ञ के साधन: पद जीवन के साधनों को लक्ष्मी माता से जोड़ता है। भोजन, वस्त्र और यज्ञ के लिए मिलने वाली संपत्ति का स्मरण है। भक्त इन साधनों के लिए माता का आभार प्रकट करता है।
- क्षीरसागर से प्रकट देवी: शुभ गुण मन्दिर का भाव अच्छे गुणों का स्थान है। क्षीरोदधि जाता देवी के क्षीरसागर से जन्म लेने का वर्णन है। क्षीर का अर्थ दूध और उदधि का अर्थ समुद्र है। चतुर्दश का अर्थ 14 है; पद समुद्र मंथन के रत्नों का स्मरण करता है।
- आरती और हृदय का आनंद: उर का अर्थ हृदय है। अंतिम पद में आरती के आनंद और पाप से मुक्ति की भक्ति भावना है।
कुछ संस्करणों में पहले पद का हरि विष्णु विधाता रूप मिलता है। ऊपर दिया पाठ हर विष्णु धाता वाला है। इसलिए यहाँ हर को शिव के नाम के रूप में समझाया है।
आरती के बाद पुष्पांजलि और क्षमा प्रार्थना
पुष्पांजलि में अंजलि में फूल लेकर देवता को अर्पित करते हैं। दोनों आरतियों के बाद यह अर्पण करके प्रणाम करें।
मंत्रपुष्पांजलि का परिचित पाठ हो तो इस चरण पर पढ़ें। इसके बाद पूजा की भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
देवी को संबोधित क्षमा प्रार्थना
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥
अर्थ: हे देवी, मैं आमंत्रण, विदाई और पूजन की विधि पूरी तरह नहीं जानता। मेरी भूलों को क्षमा करें और पूजा स्वीकार करें। मंत्र, क्रिया या भक्ति में रह गई कमी पूरी करें। मेरी पूजा पूर्ण हो, यही प्रार्थना है।
परमेश्वरि, सुरेश्वरि और देवि यहाँ देवी को संबोधित शब्द हैं। लक्ष्मी माता से क्षमा माँगते समय यह प्रार्थना पढ़ें। दोनों देवताओं से एक साथ प्रार्थना के लिए नीचे का हिंदी पाठ पढ़ सकते हैं।
आवाहन का अर्थ देवता को पूजा में आमंत्रित करना है। यहाँ विसर्जन अनुष्ठान के अंत में देवता की विदाई के लिए आया है। मूर्ति को जल में विसर्जित करना दूसरी क्रिया है।
हिंदी में समर्पण प्रार्थना
हे लक्ष्मी माता और गणेश जी, मेरी पूजा स्वीकार करें।
मेरे विचार, वचन और कर्म आपको समर्पित हैं।
अपने मन की प्रार्थना भी हिंदी में कर सकते हैं। प्रणाम करके पूजा समाप्त करें और प्रसाद बाँटें।
लक्ष्मी गणेश पूजा के मंत्र और आरती से जुड़े प्रश्न
क्या सभी मंत्र एक ही पूजा में पढ़ना जरूरी है?
छोटी घरेलू पूजा में सभी दिए हुए पाठ जोड़ना जरूरी नहीं है। नमस्कार और स्तुति के लिए उपयुक्त पाठ चुन सकते हैं। निर्धारित जप करते हों तो उसका पूरा मंत्र और क्रम पढ़ें।
क्या हर मंत्र 108 बार पढ़ना जरूरी है?
हर मंत्र 108 बार पढ़ना जरूरी नहीं है। अर्पण मंत्र संबंधित वस्तु चढ़ाते समय पढ़ें। निर्धारित जप-संख्या का संकल्प लिया हो तो उसका पालन करें। संकल्प यहाँ जप के लिए लिया हुआ निश्चय है।
क्या पूजा के छोटे मंत्र पढ़ने के लिए माला चाहिए?
छोटे नमस्कार और अर्पण मंत्रों के लिए माला जरूरी नहीं है। माला निर्धारित मंत्र-जप की गिनती में काम आती है।
क्या दैनिक पूजा और दीपावली पूजा के मंत्र अलग होते हैं?
छोटे नमस्कार, वंदना और आरती दैनिक पूजा में भी पढ़ सकते हैं। दीपावली की विस्तृत पूजा में स्नान, वस्त्र और दूसरे अर्पण जुड़ सकते हैं।
मंत्र पढ़ते समय कोई शब्द भूल जाएँ तो क्या करें?
पाठ देखकर छूटा शब्द दोबारा पढ़ लें और आगे बढ़ें। कठिन शब्दों का अभ्यास पूजा से पहले करें। अंत में क्षमा प्रार्थना पढ़ते समय अपनी भूलों के लिए विनम्र निवेदन करें।