दीवाली पूजा मार्गदर्शिका

दीवाली पर किस-किस की पूजा होती है? लक्ष्मी-गणेश के साथ अन्य देवताओं का पूजन

दीवाली की लक्ष्मी पूजा में गणेशजी और माँ लक्ष्मी का मुख्य पूजन होता है। कुछ विधियों में सरस्वती, कुबेर, महाकाली, विष्णु और इंद्र का पूजन भी शामिल है। बंगाल सहित कुछ क्षेत्रों में इस अवसर पर काली पूजा प्रमुख होती है।

आपके घर की पूजा में कौन-कौन शामिल होंगे, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है। पुस्तक पूजन में सरस्वती और तिजोरी पूजन में कुबेर का ध्यान किया जा सकता है। इसलिए देवताओं के नामों के साथ उनके पूजन का तरीका जानना भी जरूरी है।

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दीवाली पर लक्ष्मी के साथ गणेशजी की पूजा क्यों होती है?

लक्ष्मी गणेश पूजा की वेदी
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गणेशजी की पूजा सबसे पहले होती है। उन्हें विघ्नहर्ता, यानी बाधाएँ दूर करने वाला देवता माना जाता है। लक्ष्मी पूजन की शुरुआत में आप उनसे पूजा बिना बाधा पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

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शिव पुराण की रुद्रसंहिता के कुमारखंड में गणेशजी को पहले पूजने का विधान है। अध्याय 18 के श्लोक 8 और 23 में उनका यह स्थान बताया गया है। गणेशजी का प्रथम पूजन अन्य शुभ कार्यों में भी होता है।

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माँ लक्ष्मी की आराधना परिवार के सुख और समृद्धि की कामना से होती है। कार्तिक अमावस्या पर उनके पूजन का उल्लेख नारद पुराण के पूर्वभाग, अध्याय 124 में है। इस तरह दीवाली की पूजा में गणेशजी का प्रथम पूजन और लक्ष्मीजी की मुख्य आराधना होती है।

बहीखाते, कलम-दवात और तिजोरी की पूजा किन देवताओं से जुड़ी है?

कुछ दीवाली पूजा-विधियों में इन वस्तुओं को देवताओं का प्रतीक मानते हैं। इसका अर्थ वस्तु के ऊपर मूर्ति रखना नहीं है। संबंधित देवी या देवता का ध्यान करते हुए उस वस्तु के माध्यम से पूजन होता है।

ज्ञान और लेखा

बहीखाते और पुस्तकों के माध्यम से सरस्वती पूजन

सरस्वती को ज्ञान, विद्या और कला की देवी माना जाता है। पुस्तक पूजन में पढ़ाई की किताबें या व्यापार के बहीखाते रखते हैं। बहीखाते में व्यापार का हिसाब लिखा जाता है।

गुजरात में दीवाली पर शारदा पूजन और चोपड़ा पूजन की परंपरा है। शारदा सरस्वती का नाम है और चोपड़ा बहीखातों को कहते हैं। नए बहीखातों के पूजन में सरस्वती के साथ लक्ष्मी और गणेशजी की आराधना भी होती है।

आपके घर में पुस्तक पूजन होता है तो बच्चे अपनी पढ़ाई की किताबें रख सकते हैं। विद्यार्थियों की पुस्तकों और स्कूल डायरी के पूजन की परंपरा भी है। इसलिए बहीखाते न होने पर भी पुस्तक पूजन किया जा सकता है।

इस विधि में सरस्वती की अलग मूर्ति के बिना भी पूजन होता है। आप पुस्तक को देवी का प्रतीक मानकर उनके सामने ध्यान और प्रार्थना कर सकते हैं। यहाँ आराधना सरस्वती की होती है और पुस्तक उसका माध्यम बनती है।

लेखन और शक्ति

कलम-दवात के माध्यम से महाकाली पूजन

कुछ विस्तृत लक्ष्मी पूजा-विधियों में कलम-दवात को महाकाली का प्रतीक मानते हैं। दवात स्याही रखने का पात्र है। इस पूजन में कलम और दवात सामने रखकर माँ महाकाली का ध्यान करते हैं।

बहीखाते का सरस्वती पूजन और कलम-दवात का महाकाली पूजन एक ही अनुष्ठान में शामिल हो सकते हैं। दोनों में पूजन की वस्तु और देवी अलग हैं। आपकी सामग्री-सूची में ये वस्तुएँ हों तो उन्हें इसी संबंध के अनुसार तैयार रखें।

धन की रक्षा

तिजोरी या आभूषण के डिब्बे के माध्यम से कुबेर पूजन

कुबेर को धन के भंडार का रक्षक माना जाता है। उनका पूजन धनतेरस के साथ दीवाली की अमावस्या पर भी होता है। लक्ष्मी के साथ कुबेर की आराधना कुछ परिवारों की पूजा का हिस्सा है।

कुबेर की मूर्ति हो तो उसके सामने पूजन कर सकते हैं। मूर्ति न हो तो तिजोरी या आभूषण रखने वाले डिब्बे को उनका प्रतीक मानने की विधि भी है। इस तरह पूजन करने के लिए अलग कुबेर प्रतिमा की जरूरत नहीं पड़ती।

क्या लक्ष्मी के साथ विष्णु और इंद्र की पूजा भी होती है?

विष्णु पूजन

हाँ, कुछ दीवाली पूजा-विधियों में लक्ष्मी के साथ विष्णु और इंद्र का पूजन होता है। विष्णु को पूजा में पधारने की प्रार्थना करके फूल, धूप, भोग और दीप अर्पित करते हैं। देवता को पूजा में बुलाने की इस प्रार्थना को आह्वान कहते हैं।

परंपरा का अंतर

यदि आपने सुना है कि विष्णु के शयन के कारण उनकी पूजा नहीं होती, तो इसे सभी परंपराओं का नियम न मानें। लक्ष्मी के साथ विष्णु पूजन की विधि उपलब्ध है। आपके घर में लक्ष्मी-नारायण का पूजन होता है तो उसी परंपरा का पालन करें।

इंद्र पूजन

इंद्र का पूजन भी कुछ विधियों में सुख-समृद्धि की प्रार्थना के साथ होता है। यह हर घर की पूजा में शामिल नहीं होता। परिवार की पूजा में उनका स्थान हो तो संबंधित मंत्र और सामग्री उसी क्रम में रखें।

लक्ष्मी पूजा में कुलदेवता, वरुण और नवग्रह का स्थान

मुख्य लक्ष्मी पूजन के साथ आरंभिक नमस्कार, कलश स्थापना और दूसरे पूजन भी होते हैं। इन चरणों में अलग-अलग देवताओं का स्मरण आता है। किस चरण में किसका पूजन होगा, यह अपनाई गई विधि से तय होता है।

1

कुलदेवता और इष्टदेवता: कुलदेवता आपके परिवार या कुल के आराध्य होते हैं। इष्टदेवता वे देवी या देवता हैं जिनकी आप विशेष भक्ति करते हैं। लक्ष्मी पूजा की कुछ विधियों में शुरुआती नमस्कार के समय दोनों को प्रणाम करते हैं।

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कलश में वरुण देव: कलश स्थापना में वरुण देव का आह्वान और पूजन किया जाता है। इस चरण में उन्हें पूजा में पधारने की प्रार्थना करते हैं और पूजन-सामग्री अर्पित करते हैं।

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नवग्रह और सोलह मातृकाएँ: विस्तृत दीवाली पूजा में इनका पूजन भी शामिल हो सकता है। मातृकाएँ देवी-शक्तियों का एक समूह हैं। नवग्रह की संक्षिप्त विधि में कलश के सामने एक पात्र रखकर सभी नवग्रहों का एक साथ आह्वान करते हैं।

अंतर समझें

बंगाल की काली पूजा कलम-दवात पूजन से कैसे अलग है?

बंगाल की काली पूजा

बंगाल की काली पूजा में माँ काली मुख्य आराध्य देवी होती हैं। दीवाली की अमावस्या पर उनके पूजन का विशेष उत्सव मनाया जाता है। इसकी अपनी पूजा-विधि है।

लक्ष्मी पूजा का एक चरण

लक्ष्मी पूजा में कलम-दवात का महाकाली पूजन एक अलग चरण है। बंगाल की काली पूजा में पूरा मुख्य अनुष्ठान माँ काली को समर्पित होता है। इसलिए दोनों के लिए एक जैसी तैयारी या एक ही संक्षिप्त विधि लागू नहीं होती।

आपके परिवार में काली पूजा होती है तो उसके प्रचलित क्रम के अनुसार सामग्री तैयार करें। लक्ष्मी पूजा के साथ कलम-दवात पूजन होता है तो उसकी सामग्री उसी पूजा में रखें।

रामजी से जुड़े पर्व पर लक्ष्मी-गणेश का पूजन क्यों होता है?

रामजी की अयोध्या वापसी का उत्सव और लक्ष्मी पूजन, दोनों दीवाली की परंपराओं में शामिल हैं। कार्तिक अमावस्या पर लक्ष्मी पूजा का अपना धार्मिक विधान है। इसलिए रामजी की वापसी का उत्सव मनाने के साथ घर में लक्ष्मी पूजन भी होता है।

आपके घर में राम-सीता की आरती या रामनाम का पाठ होता है तो उसे पारिवारिक पूजा में स्थान दे सकते हैं। लक्ष्मी-गणेश का मुख्य पूजन होने से दूसरे आराध्य देवताओं का स्मरण बंद नहीं होता।

हनुमान, धन्वंतरि और गोवर्धन पूजा किस अवसर से जुड़ी हैं?

दीवाली के पूरे उत्सव में कई पर्व आते हैं। इनके आराध्य और पूजन के अवसर अलग हैं, इसलिए तैयारी करते समय संबंधित तिथि देखें।

हनुमान पूजा: कुछ परंपराओं में काली चौदस पर हनुमानजी का पूजन होता है। यह दीवाली उत्सव से जुड़ा है, लेकिन हर घर की अमावस्या वाली लक्ष्मी पूजा का चरण नहीं है।
धन्वंतरि जयंती: धनतेरस के अवसर पर मनाई जाती है। इसलिए धन्वंतरि से जुड़ा पूजन धनतेरस की तैयारी में आता है।
गोवर्धन पूजा: इसका विधान कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से जुड़ा है। इस अवसर पर गोवर्धन पूजन और श्रीकृष्ण को अन्नकूट अर्पित करने की परंपरा है। अन्नकूट में अनेक प्रकार के भोजन का भोग लगाया जाता है।

पंचांग में तिथियों के समय के कारण इन पर्वों की तारीख बदल सकती है। इसलिए सभी पूजाओं का समय लक्ष्मी पूजन के मुहूर्त से तय न करें।

पूजा से पहले

पूजा की सामग्री तय करने से पहले क्या पूछें?

घर के बड़े सदस्य से परिवार की पूजा का क्रम जान लें। खासकर यह पूछें कि पुस्तक, बहीखाता, कलम-दवात या तिजोरी का पूजन होता है या नहीं। इससे घर में उपलब्ध वस्तुएँ पहले तैयार कर सकेंगे।

पुरोहित पूजा करा रहे हों तो सामग्री मँगाने से पहले ये बातें पूछें:

1
लक्ष्मी-गणेश के साथ किन देवताओं का पूजन होगा?
2
किसके लिए मूर्ति या चित्र चाहिए?
3
पुस्तक, कलम-दवात और तिजोरी में से किनका उपयोग होगा?

उनके बताए क्रम के अनुसार सामग्री की सूची बनाएँ। घर में पहले से उपलब्ध मूर्तियों, चित्रों और दूसरी वस्तुओं के बारे में भी बता दें, ताकि उसी अनुसार तैयारी हो सके।

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