दीवाली पर लक्ष्मी पूजा कैसे करें? घर पर संकल्प से आरती तक पूजा विधि
दीवाली पर लक्ष्मी पूजा के लिए चौकी और सामग्री तैयार करें। संकल्प लेकर पहले गणेश जी का पूजन करें। फिर लक्ष्मी जी को जल, वस्त्र, तिलक, अक्षत और फूल अर्पित करें। धूप-दीप दिखाने और भोग लगाने के बाद प्रार्थना तथा आरती करें।
मुख्य लक्ष्मी पूजन अपने शहर के शुभ मुहूर्त में करें। मूर्ति को स्नान कराने से पहले देखें कि वह किस चीज की बनी है। तस्वीर और रंगी हुई मिट्टी की मूर्ति पर जल या पंचामृत न डालें। इनके लिए जल अलग कटोरी में अर्पित करें।
पूजा विधि शुरू करें
पूजा से पहले चौकी और थाली कैसे तैयार करें?
स्नान करके साफ कपड़े पहनें। चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएँ और लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति रखें। तस्वीर हो तो उसे सहारा देकर टिकाएँ। दोनों मूर्तियों या तस्वीरों की धूल पहले साफ कर लें।
पूजा करने वाला व्यक्ति पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ सकता है। घर के मंदिर में स्थायी रूप से स्थापित मूर्ति हो तो उसके सामने बैठें।
पूजा की सामग्री पास रखें:
बर्तनों को उनके काम के अनुसार अलग रखें:
जल अर्पित करने का तरीका: दाएँ हाथ में चम्मच लेकर लोटे से थोड़ा जल लें। चम्मच देवता के सामने कुछ क्षण थामें, फिर जल छोड़ने की कटोरी में डालें। इस तरीके में जल सीधे मूर्ति या तस्वीर पर नहीं डाला जाता।
भोग की थाली को स्नान की थाली से दूर रखें। दीपक के पास फूल, कपड़ा या कागज न रखें।
कलश स्थापना भी करनी हो तो उसकी सामग्री पहले तैयार करें। नीचे गणेश जी का संक्षिप्त पूजन और मुख्य लक्ष्मी पूजन दिया है। प्राण-प्रतिष्ठा करके स्थापित मूर्ति की सेवा में पहले से चली आ रही विधि अपनाएँ।
मुहूर्त शुरू होने से पहले क्या कर सकते हैं?
चौकी सजाना, सामग्री रखना और भोग तैयार करना पहले पूरा करें। मंत्र और आरती के बोल भी खोलकर रखें, ताकि पूजा के बीच उन्हें खोजना न पड़े।
द्रिक पंचांग की विस्तृत दीवाली विधि में प्रारंभिक पूजाएँ पहले शुरू की जा सकती हैं। मुख्य लक्ष्मी पूजन उपलब्ध मुहूर्त में रखा जाता है। शेष पूजाएँ उसके बाद जारी रह सकती हैं।
अपने स्थान का समय लक्ष्मी पूजा 2026 की तारीख और शहरवार मुहूर्त में देखें। दूसरे शहर का समय अपने स्थान पर लागू न करें।
घर पर लक्ष्मी पूजा की विधि
नीचे प्रत्येक चरण के साथ अर्पण का तरीका दिया है। हिंदी प्रार्थनाएँ बोलने के उदाहरण हैं; इनके शब्द अपनी बात के अनुसार रख सकते हैं।
आचमन करें और पूजा का संकल्प लें
आचमन के लिए पीने योग्य जल लें। बाएँ हाथ में चम्मच लेकर दाईं हथेली में थोड़ा जल डालें। मंत्र बोलकर हथेली से थोड़ा जल पिएँ।
हर मंत्र से पहले हथेली में जल दोबारा लें:
तीनों नाम बोलकर आचमन करने के बाद हाथ धो लें। यह आचमन का एक प्रचलित क्रम है; परिवार में सीखा हुआ क्रम अलग हो तो वही करें।
अब दाईं हथेली में थोड़ा जल, कुछ अक्षत और एक फूल लें। अपना नाम, स्थान और पूजा का उद्देश्य कहते हुए संकल्प लें।
हिंदी में यह संकल्प बोल सकते हैं। “लेता हूँ” या “लेती हूँ” अपने अनुसार चुनें:
मैं, [अपना नाम], [स्थान का नाम] में दीवाली के अवसर पर श्रीगणेश और माता लक्ष्मी की पूजा का संकल्प लेता/लेती हूँ। यह पूजन मेरे परिवार के कल्याण, सद्बुद्धि और सुख-शांति के लिए है।
संकल्प के बाद हथेली का जल, अक्षत और फूल अर्पण की थाली में छोड़ें। हाथ धोकर साफ कपड़े से पोंछ लें।
पहले गणेश जी का पूजन करें
गणेश जी के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करें। यह मंत्र बोलें:
ॐ गं गणपतये नमः।
इस मंत्र से गणेश जी को नमस्कार किया जाता है। इसका पाठ गणपति अथर्वशीर्ष में मिलता है।
अब गणेश जी का संक्षिप्त पूजन करें:
प्रत्येक अर्पण के साथ गणेश मंत्र भी बोल सकते हैं। पूजन के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करें: “हे गणेश जी, हमारी पूजा स्वीकार करें और सद्बुद्धि दें।”
लक्ष्मी जी का ध्यान और आवाहन करें
लक्ष्मी जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने हाथ जोड़ें। कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी का ध्यान करें और एक फूल हाथ में लें।
देवी का स्वागत करते हुए प्रार्थना करें:
हे माता लक्ष्मी, हमारी पूजा स्वीकार करें। हम श्रद्धापूर्वक आपका स्वागत करते हैं।
फूल मूर्ति के चरणों में या तस्वीर के सामने अर्पण की थाली में रखें। पूजा में इस स्वागत को आवाहन कहते हैं।
अब कुछ अक्षत अर्पित करके कहें, “माता लक्ष्मी, कृपया आसन स्वीकार करें।” अक्षत मूर्ति के पास या अर्पण की थाली में रखें।
पाद्य, अर्घ्य और आचमन का जल अर्पित करें
इस चरण में देवी को तीन बार अलग प्रयोजन से जल दिया जाता है। हर बार लोटे से थोड़ा जल लें और अर्पण के बाद जल छोड़ने की कटोरी में डालें।
पाद्य, चरणों के लिए जल
चम्मच में जल लेकर कहें, “माता लक्ष्मी, आपके चरणों के लिए यह जल अर्पित है।” जल कटोरी में छोड़ें।
अर्घ्य, स्वागत के लिए जल
दोबारा जल लें और कहें, “माता लक्ष्मी, स्वागत के लिए यह अर्घ्य स्वीकार करें।” इसे भी कटोरी में छोड़ें।
आचमनीय, आचमन के लिए जल
तीसरी बार जल लेकर कहें, “माता लक्ष्मी, आचमन के लिए यह जल स्वीकार करें।” अर्पण के बाद जल कटोरी में डालें।
यह जल देवी को अर्पित किया जा रहा है। इसे स्वयं नहीं पीना है। स्वयं आचमन करने की क्रिया पहले चरण में पूरी हो चुकी है।
मूर्ति या तस्वीर के अनुसार स्नान कराएँ
पहले देखें कि मूर्ति किस चीज की बनी है। मिट्टी, लकड़ी, रंगी मूर्ति और तस्वीर को बिना भिगोए साफ करें। प्रतिमा की बनावट के अनुसार स्नान और सफाई का भेद धार्मिक ग्रंथ में भी है।
जल से स्नान कराने योग्य मूर्ति
धातु या पत्थर की मूर्ति हो तो भी उसके रंग और सजावट की जाँच करें। मूर्ति के साथ दिए सफाई के निर्देश देखें। पानी या पंचामृत से नुकसान होने का संदेह हो तो नीचे दिया बिना भिगोए अर्पण का तरीका अपनाएँ।
स्नान योग्य मूर्ति को स्नान की थाली में रखें। पहले थोड़ा साफ जल चढ़ाएँ। पंचामृत स्नान करते हों तो तैयार पंचामृत अर्पित करें।
इसके बाद साफ जल से पंचामृत धो दें। मुलायम कपड़े से मूर्ति सुखाकर चौकी पर वापस रखें।
मिट्टी की मूर्ति, रंगी मूर्ति या तस्वीर
साफ सूखे मुलायम कपड़े से धूल हटाएँ। तस्वीर, फ्रेम और मूर्ति पर जल या पंचामृत न डालें।
चम्मच में जल लेकर देवी के सामने थामें। कहें, “माता लक्ष्मी, स्नान के लिए यह जल स्वीकार करें।” फिर उसे जल छोड़ने की कटोरी में डालें।
वस्त्र, तिलक, अक्षत और फूल अर्पित करें
मूर्ति को वस्त्र पहनाना संभव हो तो साफ वस्त्र पहनाएँ। वस्त्र पहनाना संभव न हो तो उसे अर्पण की थाली में रखें। मौली दे रहे हों तो वस्त्र के प्रतीक के रूप में उसी थाली में अर्पित करें।
तस्वीर की पूजा में भी वस्त्र सामने रखी अर्पण की थाली में दें। तस्वीर पर कपड़ा चढ़ाना आवश्यक नहीं है।
अब मूर्ति के मस्तक पर चंदन या रोली का तिलक करें। तस्वीर या रंगी सतह पर दाग पड़ने का डर हो तो तिलक की सामग्री अर्पण की थाली में रखें।
इसके बाद अक्षत और फूल चढ़ाएँ। मूर्ति हो तो चरणों में रखें; तस्वीर हो तो अर्पण की थाली में दें।
अर्पण करते समय कहें:
श्रीलक्ष्मीदेव्यै नमः।
इसका अर्थ है, श्रीलक्ष्मी देवी को नमस्कार। वस्त्र देते समय “माता, यह वस्त्र स्वीकार करें” और फूल देते समय “ये फूल स्वीकार करें” भी कह सकते हैं।
धूप और दीप अर्पित करें
धूपदान को उसके पकड़ने वाले हिस्से से उठाएँ। लक्ष्मी जी के सामने धूप दिखाते हुए कहें, “माता लक्ष्मी, यह धूप स्वीकार करें।” धूपदान को वापस रख दें।
अब जलता दीपक सीधा पकड़कर देवी के सामने दिखाएँ। कहें, “माता लक्ष्मी, यह दीप स्वीकार करें।” दीपक को समतल जगह पर, कपड़े और फूलों से दूर रखें।
गणेश पूजन में जलाया गया दीपक इस चरण में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यहाँ दीप अर्पित हो रहा है; अंत में आरती अलग से होगी।
भोग लगाएँ और उसके बाद जल अर्पित करें
भोग की थाली लक्ष्मी जी के सामने रखें। ढकी हुई हो तो ढक्कन हटाएँ और हाथ जोड़ें।
यह प्रार्थना करें:
हे माता लक्ष्मी, श्रद्धा से अर्पित यह भोजन स्वीकार करें।
देवी को अर्पित भोजन को नैवेद्य कहते हैं। फल, मिठाई या घर में बना प्रसाद चढ़ा सकते हैं। भोग चुनने के लिए लक्ष्मी पूजा के भोग और प्रसाद की सूची देखें।
भोग के बाद थोड़ा जल लेकर कहें, “माता, पीने के लिए जल स्वीकार करें।” फिर आचमन के लिए अलग से जल अर्पित करें। दोनों बार जल छोड़ने की कटोरी इस्तेमाल करें।
भोग की थाली पूजा पूरी होने तक सामने रहने दें। उसे स्नान की थाली या अर्पित जल से अलग रखें।
प्रार्थना करें और पुष्पांजलि दें
दोनों हाथों में फूल लेकर लक्ष्मी जी के सामने प्रार्थना करें। परिवार के कल्याण और सद्बुद्धि के लिए अपनी बात कहें।
उदाहरण के लिए:
हे माता लक्ष्मी, हमारे घर में अन्न और आजीविका बनी रहे। हमें धन का उचित उपयोग करने और जरूरतमंदों की सहायता करने की बुद्धि दें।
प्रार्थना के बाद फूल मूर्ति के चरणों में या अर्पण की थाली में रखें। हाथों में फूल लेकर इस तरह समर्पित करने को पुष्पांजलि कहते हैं।
श्रीसूक्त का पाठ करना चाहें तो पूजा पूरी होने के बाद पढ़ सकते हैं। द्रिक पंचांग की दीवाली विधि में पूजा के बाद श्रीसूक्त और लक्ष्मी स्तुति पढ़ने का उल्लेख है।
आरती, प्रणाम और क्षमा-प्रार्थना करें
आरती की थाली में दीपक रखें। पहले गणेश जी की आरती करें, फिर लक्ष्मी जी की आरती गाएँ। दोनों के बोल लक्ष्मी-गणेश की आरती के पूरे पाठ में दिए हैं।
दीपक सीधा रखें और थाली देवप्रतिमा के सामने घुमाएँ। थाली को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाएँ। आरती पूरी होने पर उसे समतल जगह पर वापस रख दें।
अब हाथ जोड़कर प्रणाम करें। क्षमा-प्रार्थना अपनी भाषा में कह सकते हैं:
हे गणेश जी और माता लक्ष्मी, पूजा में हुई भूल क्षमा करें। हमारी श्रद्धा स्वीकार करें और परिवार पर कृपा बनाए रखें।
परिवार के सदस्य भी प्रणाम करें। आरती की थाली रखने के बाद प्रसाद बाँटें।

पूजा के बाद फूल और मूर्ति का क्या करें?
अर्पित फूलों से धागे और प्लास्टिक अलग कर लें। साफ जैविक फूलों के लिए कम्पोस्ट या पूजा के फूल जमा करने की स्थानीय व्यवस्था इस्तेमाल करें।
भोग की थाली और मूर्ति के स्नान की थाली अलग रखें। स्नान की थाली में इकट्ठे जल या पंचामृत को खाने के लिए रखे प्रसाद में न मिलाएँ।
घर के मंदिर की मूर्ति को उसके स्थान पर रहने दें। पूजा समाप्त करने की प्रार्थना और मूर्ति को पानी में विसर्जित करना अलग बातें हैं। प्राण-प्रतिष्ठित स्थायी मूर्ति को प्रत्येक पूजा के बाद विदा करने का नियम नहीं है।
दीपक जलता रहे तो उसकी देखरेख करें। उसे पर्दे, कपड़े और कागज से दूर रखें।
घर पर लक्ष्मी पूजा से जुड़े सवाल
संस्कृत मंत्र न आते हों तो पूजा में क्या बोलें?
गणेश जी के लिए “ॐ गं गणपतये नमः” और लक्ष्मी जी के लिए “श्रीलक्ष्मीदेव्यै नमः” पढ़ सकते हैं। अर्पण करते समय अपनी भाषा में प्रार्थना भी करें।
जैसे फूल देते समय कहें, “माता, ये फूल स्वीकार करें।” लंबे मंत्र याद न हों तो पुस्तक से पढ़ें।
क्या हर दीवाली नई लक्ष्मी-गणेश मूर्ति लेना जरूरी है?
घर में पहले से पूजित मूर्ति हो तो उसकी पूजा कर सकते हैं। केवल दीवाली आने के कारण उसे बदलना जरूरी नहीं है।
कुछ परिवार दीवाली पर नई मूर्ति लाते हैं। घर के नियमित प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह की सेवा इससे अलग होती है; उसकी स्थापित विधि जारी रखें।
क्या लक्ष्मी पूजा के साथ हवन करना जरूरी है?
इस घरेलू पूजा-क्रम में हवन शामिल नहीं है। हवन सहित अनुष्ठान में उसके लिए अलग सामग्री, मंत्र और विधि की जरूरत होती है।
परिवार की दीवाली पूजा में हवन होता हो तो उसे उसी अनुष्ठान के अनुसार करें। मुख्य लक्ष्मी पूजन के निर्देशों को हवन की विधि न मानें।
गोत्र मालूम न हो तो संकल्प में क्या कहें?
ऊपर दिए हिंदी संकल्प में अपना नाम, स्थान और पूजा का उद्देश्य कहें। किसी तैयार संस्कृत संकल्प में काल्पनिक गोत्र न भरें।
पुरोहित से पूजा करा रहे हों तो उन्हें पहले बता दें कि गोत्र ज्ञात नहीं है। वे अपनाई जा रही संकल्प-विधि के अनुसार पाठ बताएँगे।

