दीवाली पूजा में किन गलतियों से बचें? सामग्री, पूजा के समय और विधि से जुड़ी सावधानियाँ
दीवाली पूजा में अपने शहर का मुहूर्त चुनें। लक्ष्मी और गणेश जी को चढ़ाने वाली सामग्री का अंतर जानें। तस्वीर या कच्ची मिट्टी की मूर्ति को पंचामृत से न नहलाएँ। संकल्प में अपना नाम और स्थान बोलें। मंत्र के साथ बताई गई क्रिया भी करें। घंटी, शंख और तुलसी के लिए अलग पूजा-परंपराओं के निर्देश एक साथ न मिलाएँ। पूजा में कोई वस्तु या चरण छूटे तो उसी का समाधान देखें। हर भूल के लिए पूरी पूजा दोहराने का नियम मान लेना ठीक नहीं है।
दीवाली पूजा में इन गलतियों से बचें
गलत शहर या वर्ष का मुहूर्त अपनाना।
हर देवता को एक जैसी सामग्री चढ़ाना।
तस्वीर या कच्ची मिट्टी की मूर्ति को भिगोना।
संकल्प में अपना विवरण न भरना।
नामावली और मंत्र-जप को एक समझना।
मंत्र के साथ बताई गई क्रिया छोड़ देना।
विसर्जन का अर्थ पढ़े बिना मूर्ति हटाना।
जलता दीपक बिना निगरानी छोड़ना।
सामग्री-सूची की हर चीज लक्ष्मी जी पर न चढ़ाएँ
दीवाली की सामग्री-सूची में लक्ष्मी-गणेश पूजन के साथ दूसरे पूजन का सामान भी हो सकता है। कुछ सूचियाँ पूरे पाँच दिन के पर्व के लिए होती हैं। उन्हें केवल लक्ष्मी जी को चढ़ाने वाली वस्तुओं की सूची न समझें।
दूर्वा, तुलसी, कलम और बहीखाते का उपयोग एक जैसा नहीं है। सूची में वस्तु का नाम मिलने पर उसका पूजन-चरण देखें। बहीखाता पूजा का सामान लक्ष्मी जी के स्नान या भोग की सामग्री में शामिल नहीं होता।
एक ही चौकी पर कई देवताओं की पूजा कर रहे हों तो उनके अर्पण अलग पहचानें। संयुक्त लक्ष्मी-गणेश तस्वीर होने पर भी दोनों को हर वस्तु चढ़ाना जरूरी नहीं है। जिस देवता का मंत्र पढ़ रहे हैं, उसी के लिए बताई सामग्री चढ़ाएँ।
सामग्री खरीदने से पहले यह भी देखें कि आपने कौन-सी विधि चुनी है। विस्तृत पूजन की सूची और छोटे घरेलू पूजन की सूची अलग हो सकती हैं। दूसरी सूची में अधिक वस्तुएँ देखकर अपनी पूजा को अपने आप अधूरा न मानें।
अक्षत, फूल या वस्त्र न मिले तो क्या करें?
अक्षत के लिए साबुत चावल रखें। टूटे चावल को अक्षत समझकर न चुनें। चावल का एक दाना टूट जाने से धनहानि होगी या पूजा निष्फल होगी, ऐसा परिणाम इस निर्देश में नहीं बताया गया है।
फूल चुनते समय सड़े या फफूँद लगे फूल हटा दें। सूखे फूलों और पत्तों के धार्मिक नियम में कुछ अपवाद भी मिलते हैं। इसलिए कमल, बिल्व और हर दूसरे फूल-पत्ते के लिए मन से एक जैसी अवधि तय न करें। कोई विशेष पत्ता इस्तेमाल करना हो तो उसी का नियम देखें।
देवी का छोटा वस्त्र न मिले तो कुछ लक्ष्मी-पूजा विधियों में रूई या अक्षत का विकल्प है। आपकी विधि में यह विकल्प हो तो वस्त्र चढ़ाने के चरण में उसका उपयोग करें। इसे दीपक, जल और भोग का विकल्प न मानें।
किसी दूसरी सामग्री का विकल्प पूछते समय उसका नाम और उपयोग बताएँ। पूजा में चढ़ाने के लिए माँगा गया घी और हवन की आहुति का घी अलग कामों के लिए है। केवल “घी नहीं है” कहने से यह पता नहीं चलता कि किस चरण का विकल्प चाहिए।
गणेश जी और लक्ष्मी जी के लिए तुलसी का नियम अलग देखें
एक ही सामग्री का नियम हर देवता, पर्व और व्रत में समान नहीं होता।
दीवाली के सामान्य गणेश पूजन में तुलसी न चढ़ाएँ। गणेश जी के लिए रखी दूर्वा और फूलों में तुलसी न मिलाएँ। गणेश पूजन में तुलसी का निषेध मिलता है।
लक्ष्मी जी के लिए यही उत्तर अपने आप लागू नहीं होता। कुछ दीवाली पूजा-विधियों में लक्ष्मी जी के प्रसाद के साथ तुलसी रखी जाती है। आपके घर में यह रीति है तो तुलसी का उपयोग उसी चरण में करें।
घर की विधि में तुलसी नहीं चढ़ाते तो किसी ऑनलाइन सूची में नाम देखकर उसे अनिवार्य न मानें। पहली बार पूजा कर रहे हैं तो पूरी चुनी हुई विधि देखें। केवल सामग्री-सूची में तुलसी का नाम देखकर उसका उपयोग तय न करें।
किसी विशेष गणेश-व्रत में तुलसी का निर्देश पढ़ें तो उसे दीवाली पूजा में न जोड़ें। विशेष दूर्वागणपति-व्रत के वर्णन में अलग निर्देश मिलता है। पर्व और व्रत का संदर्भ बदले तो सामग्री का नियम भी बदल सकता है।
क्या पिछले वर्ष की मूर्ति से पूजा कर सकते हैं?
केवल पिछले वर्ष की होने से मूर्ति को टूटी हुई मूर्ति जैसा न समझें। घर में नियमित पूजा वाली धातु की प्रतिमा और हर दीवाली लाई जाने वाली मिट्टी की मूर्ति के बारे में एक जैसा निर्णय न लें। पहले देखें कि आपके घर में किस प्रतिमा को बदलने की परंपरा है।
मूर्ति पुरानी है, लेकिन टूटी नहीं है: उसकी पूजा जारी रखने का निर्णय घर की अपनाई हुई विधि के अनुसार करें। केवल नई खरीदारी को पूजा की एकमात्र शर्त न मानें। दैनिक धातु-प्रतिमा पूजन का धार्मिक वर्णन भी मिलता है।
मूर्ति का अंग टूटा है: इसे केवल पुराना रंग या धूल समझकर अनदेखा न करें। खंडित प्रतिमा के पूजन का अलग निषेध है। प्रतिमा बदलने और सम्मानपूर्वक हटाने की प्रक्रिया पूछें।
प्रतिमा की स्थायी प्रतिष्ठा हुई है: उसके आवाहन और विदा करने के नियम अलग हैं। केवल कई वर्षों से घर में रखी होने को स्थायी प्रतिष्ठा का प्रमाण न मानें। यह जानें कि स्थापना किस विधि से हुई थी।
किन मूर्तियों पर जल या पंचामृत नहीं डालना चाहिए?
तस्वीर और कच्ची मिट्टी की मूर्ति पर दूध-पंचामृत न डालें। तस्वीर खराब हो सकती है और कच्ची मिट्टी गल सकती है। रंगी हुई प्रतिमा का रंग भी पानी से उतर सकता है।
मिट्टी, रंग और लकड़ी की प्रतिमाओं के लिए बिना पानी सफाई का निर्देश है। इसलिए पुस्तिका में स्नान लिखा देखकर हर प्रतिमा को एक जैसा नहलाना जरूरी न मानें। प्रतिमा किस चीज की बनी है, यह पहले देखें।
धातु की मूर्ति पर भी रंग, चिपकी सजावट या अलग आभूषण हो सकते हैं। केवल धातु होने से उसके हर हिस्से को पानी में डुबोना ठीक नहीं होता। मूर्ति के साथ मिले सफाई के निर्देश पढ़ें।
तस्वीर से पूजा कर रहे हैं तो स्नान वाले चरण के लिए तस्वीर के अनुकूल विधि लें। “प्रतीकात्मक स्नान” पढ़कर मन से जल डालने की प्रक्रिया न बनाएँ। पूजा कराने वाले व्यक्ति को पहले बताएँ कि आपके सामने तस्वीर है या किस सामग्री की मूर्ति है।
पीने के लिए तैयार पंचामृत अलग रखें। मूर्ति के रंग या गोंद के संपर्क में आया दूध उसमें न मिलाएँ। स्नान के लिए इस्तेमाल किया पात्र भी प्रसाद के पात्र से अलग रखें।
अमावस्या, प्रदोष और पूजा मुहूर्त को एक न समझें
अमावस्या शुरू होने का समय अपने आप लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त नहीं है। तिथि की शुरुआत सुबह या दोपहर में भी हो सकती है। दीवाली के लक्ष्मी पूजन में अमावस्या वाली शाम के प्रदोष का विधान मिलता है।
पंचांग में इन तीन बातों को अलग पढ़ें:
अमावस्या तिथि: तिथि कब शुरू और समाप्त होती है।
प्रदोष काल: सूर्यास्त के बाद शाम का निर्धारित काल।
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: उस पंचांग में पूजा के लिए चुनी गई अवधि।
स्थिर लग्न के आधार पर मुहूर्त चुना गया हो तो वह पूरे प्रदोष से छोटा हो सकता है। मुहूर्त समाप्त होने का अर्थ यह नहीं कि अमावस्या भी समाप्त हो गई। इसी तरह पूरी अमावस्या को एक ही पूजा मुहूर्त समझना ठीक नहीं है।
समय देखते हुए शहर, वर्ष और पूजा का नाम मिलाएँ। “लाभ चौघड़िया” लिखा समय और “लक्ष्मी पूजा मुहूर्त” लिखा समय अलग पद्धतियों से चुने जा सकते हैं। एक की शुरुआत और दूसरे की समाप्ति जोड़कर नया समय न बनाएँ।
शाम का मुहूर्त छूट गया हो: अपने स्थान पर अमावस्या समाप्त होने से पहले दूसरे स्थिर लग्न का विकल्प देखा जा सकता है। उसे स्थानीय पंचांग और अपनी पूजा-विधि के अनुसार जाँचें। दूसरे शहर का देर तक चलने वाला मुहूर्त अपने लिए न अपनाएँ।
संकल्प में अपना नाम और स्थान बोलें
संकल्प में आप बताते हैं कि कौन, कहाँ और किस उद्देश्य से पूजा कर रहा है। पाठ में “अमुक” लिखा हो तो उस जगह अपना संबंधित विवरण भरें। उसे मंत्र का स्थायी शब्द समझकर न दोहराएँ।
“अमुक-नाम” की जगह अपना नाम आएगा। “अमुक-प्रदेशे” में स्थान और “अमुक-वासरे” में वार का विवरण होगा। किसी रिकॉर्डिंग में दूसरे व्यक्ति का नाम या शहर सुनाई दे तो वही अपने संकल्प में न बोलें।
गोत्र मालूम न हो तो कोई गोत्र मन से न चुनें। उस स्थान का पाठ कैसे करना है, यह अपनी परंपरा के जानकार पंडित से पूछें। नाम, स्थान और वार की तरह गोत्र का अनुमान लगाना उचित नहीं है।
पाठ में व्यापार या नए बहीखाते के पूजन का अंश भी हो सकता है। घर की पूजा करते समय देखें कि वह अंश आपके पूजन से संबंधित है या नहीं। पुस्तिका में दिए अतिरिक्त अंश को बिना उसका उपयोग पढ़े संकल्प में न जोड़ें।
मंत्र के साथ बताई गई क्रिया भी करें
पूजा-पाठ में मंत्र के साथ यह भी लिखा होता है कि फूल चढ़ाना है, जल देना है या भोग लगाना है। केवल मंत्र पढ़कर हर चरण को एक जैसा न करें। “समर्पयामि” का भाव अर्पित करना है; उसके साथ बताई वस्तु और क्रिया पहचानें।
अपने आचमन और देवी को जल देने में अंतर रखें। शुरुआत में अपने आचमन का निर्देश हो सकता है। देवी के पूजन में “आचमनीयं समर्पयामि” आए तो वह देवी को जल अर्पित करने का चरण है। दोनों जगह एक ही क्रिया अपने आप न दोहराएँ।
भोग के मंत्र में “स्वाहा” आए तो उसे हवन न समझें। नैवेद्य, यानी भोग चढ़ाने के चरण में भी “ॐ प्राणाय स्वाहा” जैसे मंत्र आते हैं। उस स्थान पर निर्देश भोग अर्पित करने का है, अग्नि में सामग्री डालने का नहीं।
मंत्र का कोई छोटा अंश अलग से सुनकर क्रिया तय न करें। उसी चरण का शीर्षक और उससे पहले लिखा निर्देश पढ़ें। इससे जल अर्पण, भोग और हवन की प्रक्रियाएँ आपस में नहीं मिलेंगी।
नामावली और मंत्र-जप की संख्या अलग समझें
नामावली में देवी के अलग-अलग नाम पढ़ते हैं। मंत्र-जप में एक चुने हुए मंत्र को दोहराते हैं। इसलिए 108 नाम पढ़ना और एक मंत्र 108 बार पढ़ना अलग अभ्यास हैं।
पूजा-पुस्तिका में 27 नाम दिए हों तो उसे 108 बार मंत्र-जप का निर्देश न समझें। कुछ लक्ष्मी-पूजा विधियों में 27, 54 या 108 नामों के विकल्प हैं। अपनी चुनी हुई नामावली और उसके साथ लिखे अर्पण का पालन करें।
विशेष जप-संकल्प में संख्या तय की हो तो उसे अलग मानें। किसी दूसरी पुस्तिका में छोटा पाठ देखकर अपना संकल्प अपने आप न बदलें। सामान्य घरेलू पूजा की सलाह से विशेष अनुष्ठान की संख्या तय नहीं होती।
लक्ष्मी पूजा में घंटी और शंख बजाएँ या नहीं?
आपके घर की लक्ष्मी पूजा में घंटी बजती है तो उसे अपने आप गलती न मानें। घंटी बजाने का निर्देश कुछ लक्ष्मी-पूजा विधियों में मौजूद है। इसलिए हर परिवार पर घंटी का एक जैसा निषेध लागू नहीं होता।
घंटी और शंख को भी एक नियम से न जोड़ें। बंगाली लक्ष्मी पूजा की एक परंपरा में घंटी नहीं बजाते, लेकिन शंख बजाते हैं। वह कोजागरी लक्ष्मी पूजा से जुड़ी पद्धति है; उसे हर घर की दीवाली पूजा का नियम न बनाएँ।
अपनी पूजा-विधि में दोनों के निर्देश अलग देखें। केवल घंटी या शंख की आवाज से निश्चित धनहानि होने का दावा करने वाली सूची के आधार पर घर की रीति न बदलें।
पूजा में मंत्र या सामग्री छूट जाए तो क्या करें?
पहले पहचानें कि क्या छूटा है। शब्द गलत पढ़ना, वस्तु न मिलना और किसी विशेष संकल्प का नियम छूटना एक बात नहीं है। हर स्थिति के लिए पूरी पूजा दोहराने का एक नियम मानकर न चलें।
मंत्र का शब्द गलत पढ़ा हो: पाठ में उसी शब्द को देखें और उसका सही उच्चारण जानें। किस मंत्र में भूल हुई है, यह बताए बिना किसी सामान्य सलाह को धार्मिक सुधार-विधि न समझें।
सामग्री न मिली हो: अपनी पूजा-विधि में उस वस्तु का विकल्प देखें। वस्त्र के लिए दिया विकल्प दूसरे सभी चरणों पर न लगाएँ। विकल्प न बताया हो तो उसी वस्तु और चरण का नाम लेकर पूछें।
पूरा चरण छूट गया हो: पूजा कराने वाले पंडित को बताएँ कि कौन-सा चरण छूटा है। अपने आप पूरे अनुष्ठान को फिर से शुरू करने या छूटा चरण कहीं भी जोड़ देने का निर्णय न लें।
अंत में क्षमा-प्रार्थना करें। इसका भाव है कि पूजा में जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए देवी से क्षमा माँगी जा रही है। यह प्रार्थना पूजा-विधि में दी गई है; इसे हर विशेष संकल्प की कमी का एक ही समाधान न मानें।
क्षमा-प्रार्थना पढ़ेंविसर्जन का अर्थ पढ़े बिना मूर्ति न हटाएँ
पूजा-पुस्तिका में “विसर्जन” का अर्थ देवताओं की विदा-प्रार्थना भी हो सकता है। इसलिए यह शब्द पढ़ते ही मूर्ति पानी में डालने का निर्णय न लें। पहले उसके नीचे दी गई क्रिया पढ़ें।
विधि में फूल और अक्षत लेकर विदा-प्रार्थना लिखी हो तो वही उस चरण का निर्देश है। मूर्ति को जल में विसर्जित करना दूसरी क्रिया है। दोनों के लिए केवल एक शब्द देखकर समान प्रक्रिया न मानें।
स्थायी प्रतिष्ठा वाली प्रतिमा के लिए उसके स्थापना-संबंधी नियम लागू होंगे। त्योहार के लिए अस्थायी रूप से स्थापित प्रतिमा की विदाई उससे अलग हो सकती है। चौकी पर रखी सभी प्रतिमाएँ एक साथ हटाने से पहले यह अंतर जानें।
जलता दीपक बिना निगरानी न छोड़ें
जलते दीपक को कपड़े, कागज़ और परदों से दूर रखें। दीया समतल जगह पर गर्मी सहने वाले पात्र में हो। बच्चों और पालतू जानवरों की पहुँच से भी उसे दूर रखें।
कमरा खाली छोड़ने या सोने से पहले दीये बुझाएँ। रातभर ज्योति जलाने की परंपरा हो तो जागकर निगरानी की व्यवस्था जरूरी है। धार्मिक उपयोग वाला दीया भी बिना निगरानी छोड़ना सुरक्षित नहीं है।

Diwali Puja Kit
लक्ष्मी–गणेश पूजा की 31 सामग्री एक व्यवस्थित किट में। पूजा शुरू करने से पहले हर वस्तु का उपयोग पहचानें।

